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आदिवासी हिंदी कवयित्रियों का सृजन संसारः सुशीला सामद से जसिंता केरकेट्टा तक
महारानी रांखोल
Page No. : 104-123
ABSTRACT
आदिवासी हिंदी कवयित्रियों का सृजन संसार न केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति का माध्यम है, बल्कि यह आदिवासी जीवन के संघर्षों, सांस्कृतिक अस्मिता, और सामाजिक चेतना का दस्तावेज भी प्रस्तुत करता है। सुशीला सामद से जसिंता केरकेट्टा तक, विभिन्न कालखंडों में आदिवासी कवयित्रियों ने अपने काव्य में व्यक्तिगत और सामूहिक अनुभवों को समाहित किया है। उनके साहित्य में आदिवासी समाज के मूल्यों, परंपराओं, प्रकृति से उनके गहरे संबंध, पितृसत्ता के प्रतिरोध और औपनिवेशिक तथा उत्तर-औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ मुखर स्वर देखने को मिलते हैं। यह लेख आदिवासी हिंदी कवयित्रियों की कविताओं का गहन अध्ययन करता है, जिसमें उनकी भाषा, शैली, भावनात्मक गहराई और विषयवस्तु का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है। इस अध्ययन में साहित्य समीक्षा, तुलनात्मक अध्ययन और पाठ विश्लेषण जैसी पद्धतियों का उपयोग किया गया है ताकि आदिवासी हिंदी साहित्य की समृद्ध परंपरा को बेहतर ढंग से समझा जा सके। साथ ही, यह लेख आदिवासी स्त्रीवाद, जल-जंगल-जमीन से जुडी चेतना, लोक परंपराओं तथा आधुनिकता के अंतर्विरोधों पर भी प्रकाश डालता है। शोध का उद्देश्य आदिवासी हिंदी साहित्य को मुख्यधारा के साहित्यिक विमर्श में उचित स्थान देना और इसकी व्यापकता तथा प्रभाव को रेखांकित करना है।
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